Ashtvinay Prakashan

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  • Nagpanchami Konachi?

    Nagpanchami Konachi?

    50.00
  • Sale! Navripublican ani Bahujanwadache Antardvnd

    Navripublican ani Bahujanwadache Antardvnd

    Original price was: ₹450.00.Current price is: ₹350.00.
  • Nili Sanskruti Kiski?

    Nili Sanskruti Kiski?

    50.00
  • Pavitrata Ke Changul Me 22 Pratidnya

    Pavitrata Ke Changul Me 22 Pratidnya

    50.00

    ‘पवित्र’ समझे जाने वाले मामलों पर सवाल न उठाने के पारंपरिक संकेत को २२ प्रतिज्ञाओं पर लागू करने से, उनको पवित्रता की परीधी में लाया गया। त्रिरत्नों के अलावा मेरा कोई आश्रय नहीं है, यह एक बार यह घोषणा करने के बाद मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूं, यह बार-बार कहने का क्या उद्देश्य है? किसी बौद्ध मंदिर/विहार में प्रवेश करने के बाद “मैं हिंदू धर्म के किसी भी देवी-देवताओं को नही मानूँगा” जैसी विभिन्न प्रतिज्ञाएं बुद्ध की मूर्ति के सामने दोहराना पूरी तरह से पागलपन है। जिस हिंदू धर्म का त्याग कर १४ अक्टूबर १९५६ को बौद्ध धर्म का स्वीकार भी किया, उसका क्रमशः त्याग और स्वीकृति की प्रतिज्ञाओं का पठन करनेवाले ‘शिक्षित अज्ञानी’ अतीत में रह रहे हैं या वर्तमान में ?

    इसलिए यदि बड़े पैमाने पर यथार्थवाद की भावना पैदा की जाती है, तो ‘पुराने स्वर्ण’ को ध्यान में रखते हुए ‘नए हीरे’ की खोज करने की आवश्यकता होगी। ‘तर्कसंगत अनुकरण’ = (अनुसरण) करने वाले बौद्धों की संख्या में वृद्धि के लिए यह पुस्तिका इस दिशा में अवश्य ही चिंतन को प्रेरित करेगी।

    डॉ. विनोद अनाव्रत

  • Pavitratachya Vilakhyat 22 Pratidnya

    Pavitratachya Vilakhyat 22 Pratidnya

    50.00

    ‘पवित्र’ (Sacred) ठरविलेल्या बाबींवर प्रश्नचिन्ह निर्माण करायचे नसते, हा रूढ संकेत 22 प्रतिज्ञांबाबत लागू केल्याने त्यांचे पवित्रीकरण झाले. त्रिरत्नांशिवाय माझे कोणतेही शरण नाही, हे एकदाचे घोषित केल्यानंतरही ‘मी हिंदू धर्माचा त्याग करतो’ हे वारंवार सांगण्याचे प्रयोजन काय ? ‘हिंदू धर्मातील कोणत्याही देवी देवतांना मानणार नाही’ अशा प्रकारच्या विविध प्रतिज्ञा बौद्ध विहारात प्रवेश केल्यानंतर बुद्ध मूर्ती पुढे उच्चारणे हा शुद्ध वेडगडपणा आहे. ज्या हिन्दू धर्माचा त्याग करून 14 ऑक्टोबर 1956 साली बौद्ध धर्माचा स्वीकारही केला, त्याचा अनुक्रमे त्याग आणि स्वीकारोक्तीच्या प्रतिज्ञांचे पठण करणारे ‘शिक्षित अज्ञ’ भूतकाळात जगत आहेत की वर्तमानात? ‘जुने ते तेव्हाचे सोने’ मानत नवे हीरे शोधण्याची गरज निर्माण होईल. शिवाय ‘तर्कशील अनुकरण’ = (अनुसरण) करणाऱ्या बौद्धांची संख्या वाढणार नाही. त्या दिशेने विचारप्रवृत्त करण्याची प्रेरणा ही पुस्तिका अवश्य देईल.

  • Punya Wan Papi

    Punya Wan Papi

    150.00
  • Rajdharma Chakra Kiska?

    Rajdharma Chakra Kiska?

    50.00
  • Samte Sathi Sangharsha Ki Samte Chi Vat

    Samte Sathi Sangharsha Ki Samte Chi Vat

    150.00
  • Shudra Netrutv Nahi Kar Sakte! / शूद्र नेतृत्व नहीं कर सकते!

    Shudra Netrutv Nahi Kar Sakte! / शूद्र नेतृत्व नहीं कर सकते!

    99.00

    नेतृत्व करने का क्या अर्थ है? अपने समूह पर नियंत्रण रखना। हालाँकि, यदि नियंत्रण खो जाए, तो विनियमन बिगड़ जाता है और अराजकता पैदा होती है। ऐसी स्थिति में, अवांछित नियंत्रण और विनियमन होता है। शूद्रों की बिल्कुल यह स्थिति है। शूद्र (मनुस्मृति काल के दलित) आज ‘अशुद्ध हिंदू’ के रूप में जी रहे हैं, उनका खुद पर कोई नियंत्रण नहीं है। एक वर्ण के रूप में, वे ब्राह्मण (हरिजन) के कब्जे में हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि शूद्रों को धर्म से सम्बंधित निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है। उन्हें बस धर्म के निर्देशों का पालन करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसीलिए वे हिंदू धर्म के नियमों को चुनौती देने से डरते है। अवज्ञा उन्हें आधुनिक युग की कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सजाओं की ओर ले जाती है। शूद्रों ने इसे स्वीकार कर लिया है, यही मुख्य समस्या है। केवल इस कारण से, शूद्र नेतृत्व नहीं कर सकते।