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Jai Bhim Sanskruti Kiski? / जय भीम संस्कृति किसकी?
₹99.00संवाद की प्रक्रिया में अभिवादन का एक असाधारण महत्व है। शिष्टाचार की अभिव्यक्ति स्वरूप उनमें भी संस्कृति होती है। इसलिए एक ही अभिवादन हमारे सभी सामाजिक संबंधों को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी नहीं हो सकता। अभिवादन के तौर पर जय-भीम, केवल अतिशूद्रों को आपस मे जोडने के लिए ही सीमित है। इससे ज़्यादा उछालने की कोशिश उसे फिर से संकिर्ण बनाने वाली साबित होगी। जिन लोगों ने १४ अक्टूबर १९५६ को बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, उन्हें जय भीम अभिवादन की समाप्ति की तारीख १३ अक्टूबर १९५६ होने का संज्ञान लेना चाहिए था। लेकिन उसके बाद भी उसका इस्तेमाल जारी रहने से डबल धमाके वाला विरोधाभास बरकरार है।
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Lagna Sanskruti
₹50.00विवाह, पारिवारिक संस्था से जुड़ा एक सामाजिक संस्कार है, इसलिए सामाजिक अनुबंध है। बौद्ध धर्म में शुभ-विवाह नही बल्कि केवल विवाह होता है। उसका शुभ-अशुभ से कोई संबंध नही है। यह दो पक्षों के बीच आपसी समझौता है। जिसकी नींव आपसी विश्वास और समयानुसार उभरती हुई नैतिकता पर टिकी है। लेकिन ‘नकल के संक्रमण’ के कारण बौद्धों ने भी अपने विवाह को हिंदुओं की संस्कृतिक परिधी में घसीटा। इसलिये हिंदू परंपराएं बौद्धों में फैल गई हैं।
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Mahabodhi Mukti Kon Pathe? / महाबोधि मुक्ती कोण पथे?
₹60.00राज्यघटनेचे कलम २५ आणि २६ धार्मिक स्वातंत्र्याचा अधिकार देते, हे खरे आहे. परंतु हे धार्मिक स्वातंत्र्य क्रांती प्रतिक्रांतीच्या परिप्रेक्ष्यात आहे. ही बाब महाबोधी मंदिर मुक्तीच्या अनुषंगाने वारंवार विसरली जात आहे. १९४९ च्या बोधीगया मंदिर अधिनियम अन्वये हिन्दू-बौद्धांचा समन्वय किंवा समझोता झाला अशा प्रकारे तो कायदा जारी करण्यात आला. मात्र बीटीएमसी act रद्दबातल होण्यात वर्तमानात मुख्य अडचण कोणती आहे याबाबत वाच्यता टाळली जात आहे. हे जाणूनबुजून केले जात आहे की अज्ञानवश ? कारण बौद्धगया मंदिर अधिनियम रद्द करावा, या मागणीच्या अनुषंगाने वर्णवर्चस्ववाद्यांच्या संरक्षणार्थ तयार केलेला १९९१ चा उपासना स्थळ कायदा ढाल होतो.
प्रतिक्रांतीच्या परिप्रेक्ष्यात विवेकी भूमिका विकसीत होण्यासाठी आवश्यक माहिती आणि संतुलित विश्लेषणाचा अभाव आढळतो. त्याची पूर्ती या माध्यमातून होईल अशी आशा बाळगून प्रस्तुत पुस्तिका लिहिली आहे. विषय बोजड वाटू नये आणि वाचताना रटाळपणा येऊ नये यासाठी बऱ्याचशा बाबींचे तपशील देणे टाळले आहेत. ते तपशील जाणून घेण्याची इच्छा असणाऱ्यांनी पुस्तकाच्या शेवटी दिलेले संदर्भ ग्रंथ तपासून खातरजमा करून घ्यावी.
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Mahabodhi: Mukti Kis Raah Se?
₹60.00‘वर्तमान युग यह प्रति-क्रांति का युग है’ ऐसा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कहते है। लेकिन बौद्धों ने सुविधाजनक रूप से उसे भूला दिया है। इसकी वजह बौद्धों की चुनिंदा तथा बिखरी हुई सक्रियता है। बौद्ध धर्म के विरुद्ध प्रतिक्रांति के युद्ध को जारी रखने के लिए ब्राह्मणवादी बाशिंदे वर्तमान में भी उतने ही सक्रिय हैं, जितने वे अतीत में थे। लेकिन बाबासाहेब द्वारा दिए गयी सार-गर्भित चेतावनी को अनदेखा करते हुए आज के बौद्ध वर्तमान में महज़ विरोध आंदोलन तथा सत्याग्रह इन अराजकता के व्याकरण को अपना रहे हैं। दुश्मन को दोष देकर बौद्ध अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। अपने शत्रुओं को चालाक, अनैतिक के रूप में प्रस्तुत कर हम न्यायी, समतावादी होने का ढिंढोरा पिट सकते हैं। लेकिन यह महज़ पलायनवाद है; खोखला आदर्शवाद है। क्योंकि इससे एक आत्म-दयामूलक दृष्टिकोण विकसित होता है।
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