“Dhamm Dharm Nahi!? / धम्म धर्म नहीं!?” has been added to your cart.
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‘जो धर्म मानव जाति के कल्याण में सहायक हो सकता है, जिसमें मनुष्य की मुक्ति का द्वार खुला है। और जिसमें मानव-मानव के बीच कोई भेदभाव नहीं बल्कि समता है, वह धर्म, धर्म शद्ध का हकदार हो सकता है”।
– डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर
इसलिए यदि हम कहते हैं कि केवल बौद्धों का ही धम्म है, तो पारंपरिक धर्म कि प्रतियोगिता से हम तुरंत बाहर हो जाते हैं। चूँकि एक धम्म की तुलना किसी अन्य धर्म से नहीं की जा सकती।
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संवाद की प्रक्रिया में अभिवादन का एक असाधारण महत्व है। शिष्टाचार की अभिव्यक्ति स्वरूप उनमें भी संस्कृति होती है। इसलिए एक ही अभिवादन हमारे सभी सामाजिक संबंधों को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी नहीं हो सकता। अभिवादन के तौर पर जय-भीम, केवल अतिशूद्रों को आपस मे जोडने के लिए ही सीमित है। इससे ज़्यादा उछालने की कोशिश उसे फिर से संकिर्ण बनाने वाली साबित होगी। जिन लोगों ने १४ अक्टूबर १९५६ को बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, उन्हें जय भीम अभिवादन की समाप्ति की तारीख १३ अक्टूबर १९५६ होने का संज्ञान लेना चाहिए था। लेकिन उसके बाद भी उसका इस्तेमाल जारी रहने से डबल धमाके वाला विरोधाभास बरकरार है।
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विवाह, पारिवारिक संस्था से जुड़ा एक सामाजिक संस्कार है, इसलिए सामाजिक अनुबंध है। बौद्ध धर्म में शुभ-विवाह नही बल्कि केवल विवाह होता है। उसका शुभ-अशुभ से कोई संबंध नही है। यह दो पक्षों के बीच आपसी समझौता है। जिसकी नींव आपसी विश्वास और समयानुसार उभरती हुई नैतिकता पर टिकी है। लेकिन ‘नकल के संक्रमण’ के कारण बौद्धों ने भी अपने विवाह को हिंदुओं की संस्कृतिक परिधी में घसीटा। इसलिये हिंदू परंपराएं बौद्धों में फैल गई हैं।
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₹60.00
‘वर्तमान युग यह प्रति-क्रांति का युग है’ ऐसा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कहते है। लेकिन बौद्धों ने सुविधाजनक रूप से उसे भूला दिया है। इसकी वजह बौद्धों की चुनिंदा तथा बिखरी हुई सक्रियता है। बौद्ध धर्म के विरुद्ध प्रतिक्रांति के युद्ध को जारी रखने के लिए ब्राह्मणवादी बाशिंदे वर्तमान में भी उतने ही सक्रिय हैं, जितने वे अतीत में थे। लेकिन बाबासाहेब द्वारा दिए गयी सार-गर्भित चेतावनी को अनदेखा करते हुए आज के बौद्ध वर्तमान में महज़ विरोध आंदोलन तथा सत्याग्रह इन अराजकता के व्याकरण को अपना रहे हैं। दुश्मन को दोष देकर बौद्ध अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। अपने शत्रुओं को चालाक, अनैतिक के रूप में प्रस्तुत कर हम न्यायी, समतावादी होने का ढिंढोरा पिट सकते हैं। लेकिन यह महज़ पलायनवाद है; खोखला आदर्शवाद है। क्योंकि इससे एक आत्म-दयामूलक दृष्टिकोण विकसित होता है।
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