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बुद्ध मूर्ति की पूजा करना सही है या गलत?

बुद्ध मूर्ति की पूजा करना सही है या गलत? क्या बौद्ध मूर्ति पूजक हैं? के सिरी धम्मानंद :-  बौद्ध मूर्ति पूजक नहीं, बल्कि आदर्श पूजक हैं। हालांकि बौद्धों में बुद्ध की मूर्तियों रखना और बुद्ध को सम्मान देना आम बात है, लेकिन बौद्ध मूर्ति पूजक नहीं हैं। मूर्ति पूजा का आम तौर पर मतलब है अलग-अलग आकार और आकृति के अनजान देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाना और सीधे उन मूर्तियों से प्रार्थना करना। प्रार्थनाएँ देवताओं से मार्गदर्शन और सुरक्षा के लिए एक अनुरोध होती हैं। देवी-देवताओं से स्वास्थ्य, धन, संपत्ति देने और विभिन्न ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कहा जाता है; उनसे गलतियों को माफ करने के लिए कहा जाता है। बुद्ध की मूर्ति की पूजा करना बिल्कुल अलग बात है। बौद्ध, बुद्ध की मूर्ति का सम्मान उस महानतम, सबसे बुद्धिमान, सबसे दयालु, करुणामय और पवित्र व्यक्ति के प्रति सम्मान के रूप में करते हैं जो इस दुनिया में कभी रहे हैं। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि यह महान व्यक्ति वास्तव में इस दुनिया में रहे और उन्होंने मानवता की बहुत बड़ी सेवा की। बुद्ध की पूजा का असली मतलब उन्हें और वे जिसका प्रतिनिधित्व करते हैं, उसे सम्मान, श्रद्धा और भक्ति देना है, न कि पत्थर या धातु की मूर्ति को ।  मूर्ति एक दृष्य माध्यम है जो किसी को मन में बुद्ध को याद करने और उनके महान गुणों को याद रखने में मदद करती है, जिन्होंने सभ्य दुनिया भर में पीढ़ी दर पीढ़ी लाखों लोगों को प्रेरित किया। बौद्ध, मूर्ति का उपयोग प्रतीक के रूप में और मन की शांति पाने के लिए एकाग्रता की वस्तु के रूप में करते हैं। जब बौद्ध बुद्ध की मूर्ति को देखते हैं, तो वे संघर्ष के विचारों को एक तरफ रख देते हैं और केवल शांति, सुकून, स्थिरता और शांति के बारे में सोचते हैं। मूर्ति मन को इस महान व्यक्ति को याद करने में सक्षम बनाती है और भक्तों को उनके उदाहरण और निर्देशों का पालन करने के लिए प्रेरित करती है। अपने मन में, श्रद्धालु बौद्ध गुरु की जीवित उपस्थिति महसूस करते हैं। यह भावना उनके पूजा के कार्य को जीवंत और महत्वपूर्ण बनाती है। बुद्ध की मूर्ति की शांति उन्हें सही आचरण और विचार के मार्ग का पालन करने के लिए प्रभावित और प्रेरित करती है। एक समझदार बौद्ध कभी भी मूर्ति से कृपा नहीं मांगता और न ही किए गए बुरे कामों के लिए माफी मांगता है। एक समझदार बौद्ध अपने मन को नियंत्रित करने, बुद्ध की सलाह का पालन करने, सांसारिक दुखों से छुटकारा पाने और अपनी विमुक्ति पाने की कोशिश करता है। जो लोग बौद्धों की मूर्ति पूजा करने के लिए आलोचना करते हैं, वे वास्तव में बौद्ध जो करते हैं, उसे गलत समझते हैं। अगर लोग अपने माता-पिता और दादा-दादी की तस्वीरें अपनी यादों में संजोकर रख सकते हैं, अगर लोग राजाओं, रानियों, प्रधानमंत्रियों, महान नायकों, दार्शनिकों और कवियों की तस्वीरें रख सकते हैं, तो निश्चित रूप से कोई कारण नहीं है कि बौद्ध लोग अपने प्यारे गुरु की तस्वीर या मूर्ति उन्हें याद करने और उनका सम्मान करने के लिए न रखें। अगर लोग अपने गुरु के महान गुणों की तारीफ़ में कुछ छंद पढ़ते हैं तो इसमें क्या बुराई है? अगर लोग अपने प्रियजनों की कब्रों पर आभार व्यक्त करने के लिए फूल चढ़ा सकते हैं, तो इसमें क्या बुराई है अगर बौद्ध भी अपने प्यारे गुरु को कुछ फूल, अगरबत्ती, धूप वगैरह चढ़ाते हैं, जिन्होंने दुखियारी इंसानियत की मदद के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया ? छवियाँ अवचेतन मन की भाषा हैं। इसलिए, प्रबुद्ध व्यक्ति की छवि अक्सर किसी के मन में पूर्णता के प्रतीक के रूप में बनाई जाती है, यह छवि अवचेतन मन में गहराई से उतर जाएगी और (अगर यह काफी मज़बूत है) तो यह आवेगों के खिलाफ एक स्वचालित ब्रेक के रूप में काम कर सकती है। बुद्ध की याद खुशी पैदा करती है, मन को ताज़ा करती है और इंसान को बेचैनी, तनाव और निराशा की स्थितियों से ऊपर उठाती है। इस प्रकार, बुद्ध की पूजा अपने सामान्य अर्थों में प्रार्थना नहीं है, बल्कि एक ध्यान है। इसलिए, यह मूर्ति पूजा नहीं है, बल्कि ‘आदर्श’ पूजा है। इस प्रकार, बौद्ध अपने जीवन का मंदिर बनाने के लिए नई ताकत पा सकते हैं। वे अपने दिलों को तब तक साफ करते हैं जब तक वे अपने अंदरूनी मंदिर में छवि को रखने के लायक महसूस नहीं करते। बौद्ध उस महान व्यक्ति को सम्मान देते हैं जिसका प्रतिनिधित्व छवि करती है। वे उनके महान व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने और उनका अनुकरण करने की कोशिश करते हैं। बौद्ध, बुद्ध की छवि को लकड़ी या धातु या मिट्टी की मृत मूर्ति के रूप में नहीं देखते हैं। यह छवि उन लोगों के लिए कुछ जीवंत चीज़ का प्रतिनिधित्व करती है जो समझते हैं और विचार, शब्द और कर्म से शुद्ध हैं। बुद्ध की छवियों उनके महान गुणों के प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। यह स्वाभाविक नहीं है कि बुद्ध के प्रति गहरा सम्मान दुनिया की सबसे बेहतरीन और सबसे सुंदर कला और मूर्तिकला के रूपों में व्यक्त किया जाए। यह समझना मुश्किल है कि कुछ लोग उन लोगों को नीचा क्यों देखते हैं जो पवित्र धार्मिक शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करने वाली छवियों को सम्मान देते हैं। बुद्ध की शांत और सौम्य छवि आदर्श सुंदरता की एक आम अवधारणा रही है। बुद्ध की छवि एशियाई संस्कृतियों की सबसे कीमती आम संपत्ति है। बुद्ध की छवि के बिना, हम एक शांत, तेजस्वी और आध्यात्मिक रूप से मुक्त व्यक्तित्व कहाँ पा सकते हैं? बुद्ध की छवि की सराहना सिर्फ़ एशियाई या बौद्ध ही नहीं करते। अनातोले फ्रांस अपनी आत्मकथा में लिखते हैं। 1 मई, 1890 को, संयोग से मैं पेरिस के म्यूज़ियम गया। वहाँ एशिया के देवताओं की शांति और सादगी में खड़े होकर, मेरी नज़र बुद्ध की मूर्ति पर पड़ी, जिन्होंने दुखी मानवता को समझ और करुणा विकसित करने के लिए बुलाया। अगर कभी कोई भगवान इस धरती पर चले थे, तो मुझे लगा कि वे यहीं थे। मुझे उनके सामने घुटने टेककर एक भगवान की तरह प्रार्थना करने का मन हुआ। एक बार एक जनरल ने विंस्टन चर्चिल को विरासत के तौर पर बुद्ध की

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Dharmchakra Pravartan Kitani Bar Kiya ja Sakta Hain?

धर्मचक्र प्रवर्तन  कितनी बार किया जा सकता है? बुद्ध ने सारनाथ से अपना धर्मप्रचार कार्यारंभ, करते हुये सिंहनाद किया था जिसे ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहते है. इस विषय में किसी की भी असहमति नहीं होने के बावजूद बाबासाहब ने दिलाई धर्मविनय दीक्षा को भी धर्मचक्र प्रवर्तन कहकर संबोधित करना उचित कैसे ? बुद्ध का भी धर्मचक्र प्रवर्तन और बाबासाहब का भी धर्मचक्र प्रवर्तन? धर्मचक्र का प्रवर्तन कितनी बार किया जा सकता है ? और धर्मचक्र का प्रवर्तन कौन कर सकता है ? ऐसा स्वाभाविक प्रश्न इस संबंध में उभरकर आता है. प्रबुद्ध भारत साप्ताहिक के 29 सितंबर 1956 के अंक मे ‘धम्मचक्र के नव-प्रवर्तन के लिये चलो नागपुर, ऐसी मुख्य शीर्षक की खबर प्रथम पृष्ठपर ही छपी थी.         ‘प्रबुद्ध भारत‘ के संपादक मंडल में बाबासाहेब चेअरमन थे, तब भी उन्हे पूछकर वो शीर्षक डाला नही था. यह बात दृढता के साथ कही जा सकती है. क्योंकि इसकी सच्चाई उस खबर के आगे कई वाक्यो में होती है वह इस प्रकार है. “प्रबुद्ध भारत के संपादको को एक विशेष संदेश डॉ. बाबासाहेब ने भेज कर बौद्ध धर्म स्वीकार करने का दिन, तिथी और समय बताया है”. इसका मतलब तत्कालीन सहसंपादक मुकुंदराव आ. आंबेडकर और उनके सहयोगियों ने ‘नव-प्रवर्तन’ यह शब्द उपयोग में लाया. 27-10-1956 का ‘प्रबुद्ध भारत’ का विशेषांक भी ‘आंबेडकर दीक्षा विशेषांक’ इस नाम से प्रकाशित किया गया था. धर्मचक्र प्रवर्तन विशेषांक इस नाम से नही. परंतु उस संदर्भ मे बाद की खबरों का समाचार-प्रेषण करते समय ‘धम्मदीक्षा’ और धर्मचक्र प्रवर्तन’ को समानार्थी मानते हुये बेझिझक उपयोग में लाये गये. बाबासाहब ने 14 अक्तूबर 1956 के दीक्षा समारोह के उपरांत 15 अक्तूबर के भाषण में भी धर्मचक्र प्रवर्तन ऐसा नही काहा. दादासाहब गायकवाड को लिखे पत्र में भी उन्होंने ‘धम्मदीक्षा’ नाम की एक पुस्तिका के बारे जानकारी चाही/मांगी थी.  ग. त्र्यं. माडखोलकर के प्रश्न का उत्तर देते हुए बाबासाहब कहते हैं, “मैं स्वयं को भगवान बुद्ध जितना बड़ा समझता नही. मै एक छोटा मनुष्य हूँ. मैने विश्व को नवीन विचार नही दिया. मै इतना ही समझता हूँ की उनका वो धर्मचक्र इस देश में विगत हजार वर्ष से स्थगित होकर रह गया था, वो पूनः प्रवर्तित करने का अवसर मुझे मिला. बाबासाहब के उपरोक्त वक्तव्य में ‘पुनः प्रवर्तीत‘ इस शब्दजोडी का अर्थ पहले से शुरू हुये धर्मचक्र को गतिमान करना ऐसा है, उसको सटिक शब्द में ‘अन्वर्तन’ बौद्ध संकल्पनाकृत वैकल्पिक शब्द है. प्रवर्तन इस शब्द का अर्थ केवल गतिमान करना इतना ही मान लेते है तो धर्मचक्र प्रवर्तन कई बार एवं कोई भी कर सकता है, ऐसा अर्थ निकलेगा. किंतु क्या यह अर्थ उचित है? बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन यह केवल धर्मचक्र गतीमान करना ऐसा अर्थ का न होकर, प्राकृतिक धर्म के नियमों का स्पष्ट खुलासा करते हुये नवीन धर्म मार्ग की नींव स्वयं रखते हुये उसे गतिमान करना इस अर्थ का है. कारण धर्मचक्र का प्रवर्तन यह केवल एकही बार किया जा सकता है. दो बार, तीन बार, या अनेकों बार नही. इस बाबत स्पष्टोक्ती अंगुत्तर निकाय के चक्रवर्ती सूत्त में है. बुद्ध कहते है, “हे भिक्खू !</strong> यह सम्यक सम्बुद्ध अर्हत, तथागत, धार्मिक, धर्मराजा, धर्माधिपत्य पहरेदारी की व्यवस्था कर, धर्म से ही अनूत्तर धर्म-चक्र का प्रवर्तन करता है. इस धर्म-चक्र को लोक में न कोई दूसरा श्रमण न कोई ब्राह्मण न देव, न मार, न ब्रह्मा न कोई और प्रवर्तीत कर सकता है.” आप गलती मानोगे या गलती दोहराते रहोगे? धर्मचक्र अनुवर्तन दिन को धर्मचक्र प्रवर्तन दिन कहकर हमने जो गलती की यह सत्य है, इसे नकारा नहीं जा सकता. किन्तु यदि हम इस गलती को स्वीकार नहीं करते तो प्रतिवर्ष एक दूसरी गलती दोहराते जाऐंगे और वह गलती होगी ‘आषाढ पूर्णिमा के दिन धर्मचक्र प्रवर्तन नहीं मनाना‘. हमें गलती का एहसास हुआ और हमने मान भी लिया. इसलिए वर्ष 2014 से ‘धर्मचक्र प्रवर्तन दिन संदेश रैली’ का आयोजन करते आ रहे है. उसका अनुसरण भारत के अन्य राज्यों मे भी हो रहा है. और हाँ पूरे भारत भर जहाँ भी बौद्ध है उन्होने भी इसी दिन धर्मचक्र प्रवर्तन दिन मनाना चाहिए इसके लिए हम उनतक पहुंचने के भरकस प्रयास करेंगे. तब भी आपका वही सवालः इससे क्या होगा? इस प्रश्न का उत्तर है- बौद्धों मे पंथवाद, संम्प्रदाय की भावना को बढावा नही मिलेगा. क्योंकि, 1956 की दीक्षा भारत मे बौद्ध धर्म के पूर्नरूद्धार/जिर्णोद्धार या कायाकल्प की घटना है. किन्तु बुद्ध द्वारा दी गयी इस पूर्व 528 की दीक्षा यह बौद्ध धर्म के जन्म से संबंधित है, बुद्ध शासन के आरंभ की घटना है. बौद्ध धर्म का जन्म होने के कारण ही तो उसका पुनरूद्धार हो सका. इसलिए पुनरूद्धार का आनंद तो जरूर मनाना चाहिए. किन्तु इस मे जन्मदिन को शामिल करेंगे तभी वह आनंद द्विगुनित होगा. पूरे दुनिया के बौद्धजन आषाढ़ पूर्णिमा के दिन को ही धर्मचक्र प्रवर्तन दिन मानते है. किन्तु भारत मे महाराष्ट्र यह एक ऐसा प्रदेश है जहाँ ‘धर्मचक्र प्रवर्तन दिन‘ अक्टूबर माह में मनाया जाता है. यदि यही परंपरा जारी रही तो, दुनिया के बौद्धों से हम स्वयं को अलग मानना शुरू करेंगे. क्योंकि वैसे भी बुद्ध पूर्णिमा दुनिया भर के बौद्धों के लिए बडा उत्सव होता है. किंतु महाराष्ट्र में बौद्धों का सबसे बडा उत्सव 14 अप्रैल होता है. महाराष्ट्रीयन बौद्धों का दूसरा बडा उत्सव दशहरा (वि. दशमी) होता है; जब की दुनिया भर के बौद्धों के लिए वह उत्सव नही है. हालांकि जिस बाबासाहब के वजह से बौद्ध धर्म मे हम दीक्षीत हुए उनके सम्मान मे 14 अप्रैल को उत्सव मनाना लाजमी है. किंतु वह उत्सव बौद्ध धर्म के पुनरूद्धारक बाबासाहब इस रूप में नही होता है. भारत के प्रोटेस्टंट हिंदू (संवैधानिक भाषा में एस.सी.) को उनके मानवाधिकार दिलाने वाले महापुरूष के रूप मे उनका जन्मदिन मनाया जाता है. इसका मतलब, सीधा लाभपहुँचने/प्राप्त होने की भावना अधिक प्रबलता से हमारे मन में बसी है. बाबासाहब आम्बेडकर को, धर्मोद्धारक के रूप में जब तक हम नही देखते, तब तक हमारी धर्मभावना को एक तर्कवाद का आधार देने वाले बाबासाहब के रूप में उन्हें जान नही पायेंगे. बाबासाहब के गुरू बुद्ध और बाबासाहब को यदि हम हमारे गुरू मानते है तो हमे गुरू की बात भी माननी पड़ेगी. हमारे गुरू ने बुद्ध की बात मानने को कही थी, जो कहते है की धर्मचक्र का प्रवर्तन केवल एक बार होता है और उसे सम्यक संबुद्ध ही करते हैं. इसलिए बुद्ध की बात का सम्मान

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History of Mahabodhi Temple and Vihar/Monastery

History of Mahabodhi Temple and Vihar   महाबोधी मंदिर आणि विहाराचा इतिहास ज्या ठिकाणी सिद्धार्थाने वज्रनिर्धार करून संबोधी प्राप्तीसाठी ध्यानस्थ झालेत ते स्थळ म्हणजे वज्रस्थली. “रक्त सुकून जाईल, मांस कुजेल, हाडे तुटून जातील, पण मला ज्ञानप्राप्ती होईपर्यंत मी हे ठिकाण सोडणार नाही.” असा कठीणतम (वज्र) निर्धार घेऊन ध्यानस्थ झाल्याने या स्थळाला वज्रस्थळी असे संबोधले गेले. (या निर्धाराला प्रेरणासमान मानत कालांतराने वज्रयानी बौद्धांनी एक प्रतीक निर्माण केले). बोधिगयेला भेट दिल्यानंतर सम्राट अशोक यांनी वज्रस्थळीचे पवित्र अस्तित्व लोकाभिमुख करण्यासाठी दगडी चबुतरे निर्माण केलेत. एक हजार सुवर्ण मुद्रा देऊन बोधिवृक्षाच्या सभोवताल दहा फूट उंच भिंत बांधून वज्रस्थळी सुशोभित करून घेतली. बुद्धाच्या चक्रमण स्थळी प्रतिकात्मक सिरीपाद निर्माण केलेत, जे आजही बघितले जाऊ शकतात. सम्राट अशोकाने तिथे एक चैत्य बांधले (इ.पू. २६०), कारण ती तत्कालिन परंपरा होती. त्यावरच पुढे मंदिराचे निर्माण केले गेल्याचे म्हटले जाते.     त्यांच्यापश्चात सम्राट कनिष्क यांचे वंशज सम्राट हुविष्क (इ.स. १२०-१६०) यांच्या कारकिर्दीत तिथे मंदिर निर्माण केले गेले; हेच ते महाबोधी मंदिर होय. ज्याला इसवी सनाच्या सातव्या शतकात चिनी तीर्थ यात्री हुएन त्सांग यांनी बघितले होते आणि त्याला मोहोपुटी असे म्हटले, यावरून महाबोधी हे संबोधन तेव्हापासून अथवा तेव्हा सुद्धा अस्तित्वात असल्याचे दिसून येते. सम्राट अशोक यांचा राज्याभिषेक इ.पू. २७० ला होतो आणि त्याच्या पाच वर्षानंतर (इ. पूर्व २६५) ते बौद्ध धर्माची विधीवत दीक्षा घेतात. त्याच्या दोन वर्षांनी म्हणजे इसवी सन पूर्व २६३ मध्ये कलिंग युद्ध घडून येते. त्याच्या दोन तीन वर्षानंतर (इ.पू.२६०) सम्राट अशोक धर्मयात्रा आरंभ करतात. महाबोधी मंदिराला सम्राट अशोक यांच्याद्वारे भेट देण्याचा हाच तो काळ होय. अशोक यांच्या दोन शतकांनंतर म्हणजे इ.पू.६० मध्ये कुरांगी, नागादेवी आणि सिरीमा या धनाढ्य दानशूर उपासिका वज्रस्थळीभवती दगडी स्तंभ उभे करून रेलिंगचे सौंदर्यकरण आणि सुवर्णविलेपन करतात. एकंदर काय तर तेव्हा मूर्तीपूजेची परंपरा नसल्याने वज्रस्थळी केवळ संरक्षित करण्याचे तसेच जिथे बुद्धाचा पदस्पर्श झाला तिथे सम्राट अशोक यांनी सिरीपाद कोरून घेतलेत. मात्र बोधीवृक्षाजवळ मंदिर बांधण्याची प्रक्रिया इ.स. १२० ते १६० दरम्यान पार पडली. याची शहानिशा अलेक्झांडर कनींगहॅम यांनी तिथे खोदकाम सुरू केल्यानंतर केली. तिथे गर्भगृहातील सिंहासनापुढे आढळलेल्या अवशेषात राजा हुविष्कच्या एका सुवर्णमुद्रेसोबतच काही चांदीचे पंचमार्क (टंकन केलेले) सिक्के मिळालेत. यावरून राजा हुविश्क या कनिष्क सम्राटाने बोधीगयेत बुद्ध मंदिर बांधले, असा निष्कर्ष निघतो. कुशाण साम्राज्याचे सम्राट कनिष्क प्रथम यांचे उत्तराधिकारी राजा हुविष्क होते. याच हुविष्क यांनी मथुरे शेजारी एक बौद्ध विहार सुद्धा बांधले. बोधिगया येथे बुद्धाच्या स्मृतीत मंदिर बांधण्याची सुरुवात राजा कनिष्क (इ.स. ७८ ते १०२) यांनी केल्याचे सुद्धा म्हटले जाते. ज्याला अंतिम रूप त्यांचा उत्तराधिकारी हुविष्क यांनी दिले. राजा कनिष्काच्या काळातच हारवन (काश्मीर) येथे चौथी बौद्ध संगिती पार पडली होती (इ.स. ७२) आणि तिथूनच महायान परंपरेला अधिकृत संमती मिळाल्याचे दिसून येते. कनिष्क राजाच्या काळात मूर्तिपूजा सुरू झाल्याने बोधीगया मंदिर बांधण्याचे श्रेय सम्राट अशोकाला जात नसून सम्राट कनिष्क-हुविष्क यांना जाते. सम्राट अशोकाने वज्रस्थळी च्या परिसरात एक विहार बांधले म्हणजे ते भिक्खू निवास होते (आजचे महाबोधी मंदिर नव्हे). भिक्खूंना ध्यान, आराम इत्यादिसाठीच्या त्या वास्तू होत्या. परंतु विहार आणि मंदिरातील फरक लक्षात न घेतल्याने सम्राट अशोकानेच बुद्धगया येथील महाबोधी मंदिर निर्माण केले अशी विपर्यस्त माहिती प्रसारित केली जाते. पण वस्तूस्थिती अशी आहे की, बुद्ध मूर्तीपूजा हा प्रकारच सम्राट अशोकाच्या काळात अस्तित्वात नव्हता. जेव्हा बुद्धापश्चात प्रतीक पूजा सुरू झाली तेव्हा एकीकडे सिरीपाद, बोधीवृक्ष, रिकामे सिंहासन, चैत्य इत्यादिंची प्रतीक पूजा सुरू होती तर दुसरीकडे यज्ञवंशीयांमध्ये यज्ञाद्वारे देवाची आळवणी करीत त्यायोगे आपल्या इच्छा-आकांक्षा पूर्ण करण्याची परंपरा होती. ज्या काळात मूर्तिपूजा सुरू झाली त्याच परंपरेच्या राजांनी बोधिगया येथे मंदिर निर्माण कार्य सुरू केले, तो महायानी होता. यास्तव बोधिगया मंदिर मुक्ती इत्यादिंचा विचार करताना थेरवाद, महायान, वज्रयान इत्यादिंची अनुक्रमिक वैचारीक विकास प्रक्रिया लक्षात घेत, बुद्धाशी निगडित जपणूक करावयाच्या संपदा, प्रेरणास्थळ, पवित्र /अति-पवित्र पूजनीय स्थळ या अर्थाने त्याकडे बघितले जाणे श्रेयस्कर. हुएन त्साँग यांनी जेव्हा इ.स. ६३७ मध्ये भेट दिली तेव्हा त्यांना तिथे दोन स्तूप आणि सहा विहार आढळलेत. तेव्हा मंदिराची उंची १६० ते १७० फूट असल्याचे त्यांनी नमूद केले. तेव्हा तिथे एक संघाराम सुद्धा होते जिथे १००० भिक्खूंच्या निवासाची सोय होती जे श्रीलंकेच्या राजाद्वारे बांधून दिले गेले होते. त्याच्या तीनशे वर्षानंतर इ.स. १०७० मध्ये पंजाबच्या शिवालिक पर्वत क्षेत्रातील राजा अशोक भल्ला यांनी मंदिराच्या जिर्णोद्धाराचे कार्य भिक्खू धर्मरक्षीत यांच्या देखरेखित पार पाडले. लेख:- डॉ. विनोद अनाव्रत.   पुस्तक: – महाबोधि मुक्ती कोण पथे? 

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